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हाईकोर्ट ने पलटा निचली अदालत का फैसला, आजीवन कारावास पाए व्यक्ति को किया बरी, जानें पूरा मामला

By on August 29, 2025 0 59 Views

नैनीताल: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने अल्मोड़ा जिले के जिला सत्र न्यायाधीश के द्वारा अभियुक्त दीपक सिंह बिष्ट को वर्ष 2018 में आजीवन कारावास की सजा दिए जाने के आदेश के विरुद्ध दायर याचिका पर सुनवाई की. मामले की सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी और न्यायमूर्ति आलोक मेहरा की खंडपीठ ने उन पर लगाए गए आरोपों को प्रॉसिक्यूटर के द्वारा सिद्ध न करने के आधार पर उन्हें बरी कर दिया.

जिला सत्र न्यायाधीश ने वर्ष 2018 में उन्हें हत्या करने के आधार पर आजीवन कारावास की सजा देने का आदेश पारित किया था. साथ में आईपीसी की धारा 302 और 201 के तहत जुर्माने से भी दंडित किया था. धारा 302 के तहत 40 हजार रुपए और 201 के तहत 5 हजार रुपए के जुर्माने से भी दंडित किया था. न देने की स्थिति में आईपीसी की धारा 302 के तहत 7 साल का अतिरिक्त कारावास और धारा 201 के तहत 6 माह की सजा सुनवाई थी.

इस आदेश को दीपक सिंह बिष्ट के द्वारा साल 2018 में उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई. जिसपर सुनवाई करते हुए खंडपीठ ने पाया कि निचली अदालत में अभियोजन पक्ष कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर पाया. इसका लाभ देते हुए अभियुक्त को बरी कर दिया. साथ में निचली अदालत के आदेश को निरस्त कर दिया.

मामले के अनुसार, पनी राम, अल्मोड़ा के गुणादित्य हॉर्टिकल्चर विभाग में ग्राम विकास अधिकारी के पद पर कार्यरत था. जिस दिन घटना हुई उस रात को दीपक के साथ दावत पर थे और विभाग के भवन में ही रह रहे थे. मौजूद घटना के दौरान उनकी मृत्यु किस कारण से हुई उसका कोई प्रत्यक्ष साक्षी उपलब्ध नहीं था. जब इसकी सूचना उनकी पत्नी को दी गई तो वे मौके पर भतीजे के साथ पहुंची. जहां देखा कि उनका पति ऑफिस के निचले बरामदे में मृत पड़ा हुआ है. उसके सिर पर चोट के निशान हैं और खून बह रहा था. यही नहीं, भवन की ऊपर की सीढ़ियों में खून लगा हुआ था, जिसे किसी ने साफ करने की कोशिश भी की, जो पूरी तरह से साफ नहीं हुआ था.

मामले की जांच में पुलिक को दीपक सिंह बिष्ट पर शक हुआ. उसी के आधार पर दीपक को गिरफ्तार किया गया और चार्जशीट दायर की गई. जिला सत्र न्यायाधीश अल्मोड़ा ने आरोपी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई. अभियुक्त ने आदेश को चुनौती उच्च न्यायालय में दी. जिसपर सुनवाई करते हुए आरोप सिद्ध न होने के कारण उच्च न्यायालय ने उन्हें बरी कर दिया.