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- कोटाबाग के डॉन-परेवा गांव के शहीद दीवान सिंह ने देश की आजादी के लिए 24 साल की उम्र में दे दी थी अपने प्राणों की आहुति, शहीद दीवान सिंह की पुण्यतिथि पर विशेष
कोटाबाग के डॉन-परेवा गांव के शहीद दीवान सिंह ने देश की आजादी के लिए 24 साल की उम्र में दे दी थी अपने प्राणों की आहुति, शहीद दीवान सिंह की पुण्यतिथि पर विशेष
देश की आजादी के लिए अपने प्राण न्यौछावर करने वाले शहीदों की फेरहिस्त में डोन परेवा के दीवान सिंह बिष्ट के नाम को भी हमेशा याद किया जाता है। सोमवार को उनकी 76 वी पुण्य तिथि मनाई जाएगी। उन्होंने महज 24 साल की उम्र में देश की आजादी के लिए मौत को गले लगा लिया था। कोटाबाग विकास खण्ड के डोनपरेवा गांव में एक साधारण किसान बचे सिंह बिष्ट के घर 5 मार्च 1921 को जन्मे दीवान सिंह के दिल मे बचपन से ही देश भक्क्ति की भावनाएं हिलोरे मारने लगी थी। देश मे महात्मा गांधी के नेतृत्व में अंग्रेजो भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ तो दीवान सिंह भी उस आंदोलन में अपने साथियों के साथ कूद पड़े। 1944 में अपने एक दर्जन साथियों के साथ उन्होंने भलोन में डाक बंगला फूक डाला। आखिर कार कालाढूंगी के जंगलो में 13 साथियों के साथ गोरी हुकूमत ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। भारत माता की जय, जय हिंद के नारे लगाते आजादी के इन मतवालों को हल्द्वानी कारागार लाया गया। जहाँ दीवान सिंह बिष्ट को कठोर कारावास की सजा सुनाते हुए बरेली जेल में भेज दिया गया। जेल में अंग्रेज शासकों ने कई बार उन्हें माफी मांगने को मजबूर किया। कई प्रकार की यातनाएं दी गयी मगर ब्रिटिश हुक्मरानों के आगे उन्होंने अपना सिर नही झुकाया। महज 24 साल की उम्र में ही 23 अगस्त 1945 को देश के इस सपूत ने जेल में ही अपने प्राण त्याग दिए।
दीवान सिंह बिष्ट की शहादत को आज 76 साल पूरे हो चुके है। पर उनके बलिदान की गाथा कोटाबाग ओर रामनगर ब्लॉक के घर घर मे सुनाई जाती है ताकि नई पीढ़ी के लोग जान सके कि देश की आजादी में इस क्षेत्र का अपना योगदान रहा है। देश को आजाद कराने में ब्रिटिश हुक्मरानों के जुल्म सहने वाले इन रणबाकुरों को आजादी की खुली हवा में सांस लेने का मौका भले ही नही मिल पाया हो लेकिन यह उनके बलिदान का ही फल है कि आज हम सभी आजादी का फल भोग रहे है।

