ढेला इंटर कालेज में पेशावर विद्रोह जयंती पर हुए कार्यक्रम……
रामनगर। ढेला इंटर कालेज में पेशावर विद्रोह की 93 वीं जयंती पर विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से चंद्रसिंह गढ़वाली व उनके साथी विद्रोही सिपाहियों को याद किया गया।कार्यक्रम की शुरुआत चंद्रसिंह गढ़वाली के चित्र पर माल्यार्पण से हुई।
बच्चों को संबोधित करते हुए अंग्रेजी प्रवक्ता नवेंदुbमठपाल ने कहा
23 अप्रैल 1930 को चंद्र सिंह गढ़वाली के नेतृत्व में अंजाम दिए गए पेशावर विद्रोह को 93 वर्ष पूरे हो गए हैं. अंग्रेजी फौज में रहते हुए पख्तून स्वतंत्रता सेनानियों पर गोली चलाने से इंकार करने की इस घटना ने अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई का एक नया मोर्चा खोल दिया.इस घटना ने अंग्रेजों को इस कदर हिला कर रख दिया कि इन सिपाहियों पर जब कार्यवाही करने की नौबत आई तो अंग्रेजी ने 23 अप्रैल को आदेश नहीं मानने का मुकदमा उन पर नहीं चलाया बल्कि 24 अप्रैल को हुक्म उदूली का मुकदमा चला कर इनका कोर्ट मार्शल किया. राजनीति विज्ञान प्रवक्ता संत सिंह ने कहा यह भारत के स्वाधीनता आंदोलन का एक गौरवशाली अध्याय है,जहां बेहद कम पढ़े-लिखे साधारण सिपाहियों ने अंग्रेजों की फूट डालो-राज करो की नीति को पलीता लगा दिया.गढ़वाली फौज को पेशावर में उतारा ही इसलिए गया था ताकि इसे हिन्दू-मुसलमान का मामला बनाया जा सके.खान अब्दुल गफ्फार खान के लाल कुर्ती दल का प्रदर्शन होना था और गढ़वाली फौज से गोली चलवाई जानी थी.इसे सीधे-सीधे साम्प्रदायिक विभाजन की खाई चौड़ी होती.पेशावर में गोली चलाने की भूमिका बनाते हुए, अंग्रेज अफसर ने इन सिपाहियों को हिन्दू-मुसलमान के झगड़े की बात ही समझाने चाही.पेशावर में गढ़वाल राइफल के इन सिपाहियों ने जो कारनामा अंजाम दिया,उसने इस देश की गंगा-जमुनी तहज़ीब को बुलन्द किया.अंग्रेजों द्वारा इन्हें मुसलमानों के खिलाफ घृणा के सिपाही में तब्दील करने की कोशिश को ध्वस्त कर दिया. शिक्षक बालकृष्ण चंद ने कहा आज चंद्र सिंह गढ़वाली और उनके सैनिक साथियों के उस साहसिक कारनामे को याद करने की जरूरत है. इन सिपाहियों ने अंग्रेजों के द्वारा एक साम्प्रदायिक कांड रचने की कोशिश के खिलाफ खड़े हो कर,उसे अंग्रेजी राज के खिलाफ एक बहादुराना विद्रोह में तब्दील कर दिया.
पेशावर में गढ़वाली पल्टन द्वारा किया गया विद्रोह भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना थी।शिक्षक सुभाष गोला ने कहा कहा अंग्रेजों के देश से चले जाने के बाद भी गढ़वाल में अकाल, पोस्ट ऑफिस के कर्मचारियों की हड़ताल, सड़क, कोटद्वार के लिये दिल्ली से रेल का डिब्बा लगे ऐसे तमाम सवालों पर उन्होंने आंदोलन किए। पेशावर विद्रोह से लेकर 1979 में जीवन के अंतिम क्षण तक चंद्र सिंह गढ़वाली निरंतर स्वाधीनता आंदोलन से लेकर तमाम जन संघर्षों में शामिल रहे। इसमें जेलों के भीतर की अव्यवस्था और राजनैतिक बंदियों के लिये की जाने वाली भूख हड़तालें भी शामिल हैं। कम्युनिस्ट पार्टी के टिकट पर चुनाव भी लड़ा और जन संघर्षों से अंतिम समय तक जुड़े रहे।चंद्र सिंह गढ़वाली का चित्र बनाओ प्रतियोगिता में अजय कुमार,सावन कुमार,राज फुलारा,अर्जुन खाती,रविंद्र फर्त्याल ने बाजी मारी जबकि खुशी बिष्ट,कोमल सत्यवली,स्वेता नेगी, आकंक्षा सुंदरियाल ,नेहा आर्या ने देशभक्ति गीत प्रस्तुत किए।।प्रधानाचार्य श्री श्रीराम यादव द्वारा सभी प्रतिभागी बच्चों को पुरुस्कृत भी किया गया।इस मौके प्रधानाचार्य श्रीराम यादव,नवेंदु मठपाल, संत सिंह,शेलेंद्र भट्ट,बालकृष्ण चंद, नरेश कुमार,सविता रावत,उषा पवार,सुभाष गोला मौजूद रहे।

