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उत्तराखंड में चिपको आंदोलन 2.0 की शुरूआत का ऐलान, पर्यावरण प्रेमियों ने दिया सरकार को अल्टीमेटम

By on March 17, 2025 0 360 Views

उत्तराखंड में एक बार फिर पहाड़ों में चिपको आंदोलन की शुरुआत का ऐलान हो चुका है. आज से 50 साल पहले जो चिपको आंदोलन की चिंगारी पहाड़ों में भड़की थी, वो आज फिर से धधकने की कगार पर है. बता दें पर्यावरणविद्धों की ओर से लगातार भानियावाला-ऋषिकेश मार्ग के चौड़ीकरण के नाम पर 3300 पेड़ों के काटे जाने का विरोध चल रहा है.

बीते रविवार को भी बड़ी संख्या में पर्यावरण प्रेमी सड़क पर उतर आए. इस दौरान उन्होंने पेड़ों को रक्षा सूत्र बांधकर उनकी सुरक्षा का संकल्प लिया. दरअसल ऋषिकेश से भानियावाला के बीच 21 किलोमीटर लंबे सड़क चौड़ीकरण प्रोजेक्ट के तहत 3300 पेड़ों को काटा जाना है. पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि 600 करोड़ की इस परियोजना में पर्यावरणीय नुकसान को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है. इन पेड़ों की छंटाई का काम भी शुरू हो चुका है, लेकिन स्थानीय लोग अब इसके खिलाफ एकजुट हो गए हैं.

पर्यावरणविदों की मानें तो देहरादून और उसके आसपास के इलाकों में पर्यावरणीय असंतुलन तेजी से बढ़ रहा है. बढ़ते तापमान की वजह से ग्लेशियर पिघलने लगे हैं, पहाड़ों में लगातार भूजल स्तर गिर रहा है और खराब होती वायु गुणवत्ता लोगों के स्वास्थ्य और जीवन पर गंभीर असर डाल रहे हैं. लेकिन इन सब बातों को दरकिनार कर विकास परियोजनाओं को बिना किसी लॉन्ग टर्म एनवायर्नमेंटल प्लानिंग के लागू किया जा रहा है.

गौरतलब है कि ये पहली बार नहीं है जब उत्तराखंड के लोग जंगलों को बचाने के लिए सड़क पर उतरे हों. पांच साल पहले 2020 में जब देहरादून एयरपोर्ट के विस्तार के लिए 243 हेक्टेयर जंगलों की बलि चढ़ाने की योजना बनी थी, तब भी जनता ने जमकर विरोध किया था और अदालत कि दखलअंदाजी की वजह से ये परियोजना ठंडे बस्ते में चली गई.
लेकिन अब राज्य में एक बार फिर से जंगलों को बचाने के लिए आंदोलन शुरु हो गया है.

ऋषिकेश-भानियावाला के बीच सड़क चौड़ीकरण का लोग लगातार विरोध कर रहे हैं. प्रदर्शनकारियों ने पेड़ों को रक्षा सूत्र बांधने के साथ ही ये ऐलान भी किया है कि अगर जरूरत पड़ी तो पहाड़ों में चिपको आंदोलन 2.0 की चिंगारी एक बार फिर धधक उठेगी. साल 1973 में उत्तराखंड के रैणी गांव से शुरू हुए इस आंदोलन ने पूरे देश को पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया था.

सुंदरलाल बहुगुणा और गौरा देवी के नेतृत्व में महिलाओं ने पेड़ों से लिपटकर अपने जंगल बचाए थे. जिसके बाद भारत वन संरक्षण को लेकर बड़े बदलाव हुए थे और आज फिर इतिहास खुद को दोहरा रहा है. लेकिन सवाल यही है कि क्या इस विरोध को गंभीरता से लेते हुए विकास की परिभाषा को नए सिरे से गढ़ा जाएगा या हमारे हरे भरे जंगलों को सिर्फ कागज़ी विकास के नाम पर मिटा दिया जाएगा.