सरकारी जमीनों के आवंटन पर कांग्रेस का हमला, माहरा बोले- आने वाली पीढ़ियों के हित से हो रहा खिलवाड़
देहरादून। राजपुर रोड स्थित एक होटल में कांग्रेस की चार्जशीट कमेटी की ओर से 12 सितंबर को आयोजित प्रेस वार्ता में प्रदेश की सरकारी और लीज की जमीनों के आवंटन को लेकर राज्य सरकार पर गंभीर आरोप लगाए गए। चार्जशीट कमेटी के अध्यक्ष करन माहरा, प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल और नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने संयुक्त रूप से सरकार पर जमीनों के इस्तेमाल में पारदर्शिता नहीं बरतने का आरोप लगाया।
करन माहरा ने कहा कि सरकारी जमीन लगातार कम होती जा रही है और इसका सीधा असर आने वाली पीढ़ियों के भविष्य पर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि यदि सरकारी जमीन सुरक्षित नहीं रहेगी तो भविष्य में प्रदेश के विकास के लिए सरकार के पास पर्याप्त भूमि उपलब्ध नहीं होगी। उनका आरोप है कि उद्यान, कुमाऊं मंडल विकास निगम, गढ़वाल मंडल विकास निगम और कृषि समेत विभिन्न संस्थानों की जमीनों का बड़े स्तर पर इस्तेमाल पहले ही किया जा चुका है।
माहरा ने कहा कि 90 वर्ष की लीज के बाद जमीन को अपने नाम कराने और उसी जमीन के आधार पर कारोबार के लिए ऋण लेने जैसी व्यवस्थाएं आम उत्तराखंडवासियों के हित में नहीं हैं। उन्होंने जमीन आवंटन की शर्तों पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि आवेदक के पास करीब 60 करोड़ रुपये की संपत्ति, 25 से अधिक देशों में कारोबार और होटल क्षेत्र में एक हजार कमरों के संचालन का अनुभव जैसी शर्तें रखी गई हैं। कांग्रेस का आरोप है कि इन शर्तों के कारण स्थानीय युवाओं और छोटे कारोबारियों के लिए अवसर सीमित हो जाते हैं और इसका लाभ बड़ी बाहरी कंपनियों को मिल सकता है।
माहरा ने डाबा माइनर क्षेत्र की करीब 1.5 लाख वर्ग मीटर भूमि के आवंटन पर भी सवाल उठाया। उन्होंने दावा किया कि यह भूमि पेट्रोलियम मंत्रालय को करीब 37 लाख 65 हजार रुपये में दी गई, जबकि इसकी बाजार दर करीब 1.50 करोड़ रुपये प्रति बीघा बताई जा रही है। उनका कहना था कि यदि सरकार को जमीन आवंटित करनी ही थी तो पारदर्शी तरीके से नीलामी की जा सकती थी, जिससे सरकार को अधिक राजस्व प्राप्त होता।
माहरा ने दावा किया कि यदि जमीन करीब एक करोड़ रुपये प्रति बीघा की दर से भी बेची जाती तो सरकार को लगभग 360 करोड़ रुपये का राजस्व मिल सकता था। उन्होंने कहा कि सरकार एक ओर प्रदेश में उद्योग और औद्योगिक भूखंड विकसित करने की बात करती है, वहीं दूसरी ओर सरकारी जमीनों को कम कीमत पर दिए जाने के मामलों पर सवाल उठ रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि संबंधित भूमि का मामला वर्ष 2025 में ही सुलझाया जा चुका था।
कांग्रेस ने एक अन्य भूमि आवंटन का मामला उठाते हुए आरोप लगाया कि करीब 36 बीघा जमीन 128.36 करोड़ रुपये में दिए जाने के महज तीन महीने बाद संशोधित आकलन में इसकी कीमत करीब 254 करोड़ रुपये आंकी गई। माहरा के अनुसार, दोनों आकलनों के बीच के अंतर के कारण सरकार को करीब 125 करोड़ रुपये के नुकसान का दावा सामने आता है।
कांग्रेस ने सरकारी जमीनों के आवंटन की पूरी प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच कराने और भविष्य में जमीन आवंटन में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की मांग की है।

