October 28, 2026
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उत्तराखंड में तीन साल में तीन वन अधिकारियों ने मांगा वीआरएस, प्रशासनिक अफसरों में बढ़ा VRS का ट्रेंड

By on October 28, 2026 0 3 Views

देहरादून। उत्तराखंड में अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारियों के समय से पहले सेवा छोड़ने के मामले एक बार फिर चर्चा में हैं। पिछले तीन साल में भारतीय वन सेवा के तीन अधिकारियों से जुड़े स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के प्रकरण सामने आए हैं। कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के निदेशक साकेत बडोला के वीआरएस लेने के फैसले ने इस विषय को फिर सुर्खियों में ला दिया है। इससे पहले मनोज चंद्रन ने अक्टूबर 2024 में वीआरएस के लिए आवेदन किया था, जबकि तत्कालीन प्रमुख वन संरक्षक धनंजय मोहन ने जून 2025 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली थी।

भारतीय प्रशासनिक सेवा, भारतीय पुलिस सेवा और भारतीय वन सेवा को देश की प्रतिष्ठित सेवाओं में गिना जाता है। इन सेवाओं में चयन के लिए कठिन प्रतियोगी परीक्षा से गुजरना पड़ता है। चयन के बाद प्रशिक्षण और प्रशासनिक जिम्मेदारियों का लंबा सिलसिला शुरू होता है। ऐसे में निर्धारित सेवानिवृत्ति आयु से पहले सेवा छोड़ने के बढ़ते मामले कई सवाल खड़े कर रहे हैं। हालांकि, अलग-अलग अधिकारियों के फैसलों के पीछे बताए गए कारण भी अलग-अलग रहे हैं।

साकेत बडोला के फैसले ने फिर बढ़ाई चर्चा

कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के निदेशक और भारतीय वन सेवा के अधिकारी साकेत बडोला ने अक्टूबर 2026 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने का निर्णय सार्वजनिक किया। उन्होंने अपने संदेश में कहा कि कई महीनों तक विचार-विमर्श के बाद व्यक्तिगत कारणों से यह फैसला लिया है। उन्होंने अपने सेवाकाल को संतोषजनक बताते हुए प्रकृति और वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में काम करने का अवसर मिलने पर आभार जताया।

साकेत बडोला उत्तराखंड में वन विभाग के कई महत्वपूर्ण पदों पर काम कर चुके हैं। वह राजाजी टाइगर रिजर्व के निदेशक भी रहे और बाद में कॉर्बेट टाइगर रिजर्व की जिम्मेदारी संभाली। पिछले साल उन्हें मुख्य वन संरक्षक पद पर पदोन्नति मिली थी। उनके फैसले की चर्चा इसलिए भी हो रही है, क्योंकि उनकी नियमित सेवानिवृत्ति में अभी करीब 11 साल बाकी बताए गए हैं।

बडोला ने अपने सार्वजनिक बयान में व्यक्तिगत कारणों का उल्लेख किया है। उन्होंने विभागीय दबाव या प्रशासनिक असंतोष को फैसले की वजह नहीं बताया। हालांकि, उनके किसी निजी संस्थान से जुड़ने की चर्चा भी है। इसे लेकर कोई आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं दी गई है।

धनंजय मोहन ने सेवानिवृत्ति से पहले छोड़ी सेवा

वन विभाग के तत्कालीन प्रमुख वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख धनंजय मोहन ने जून 2025 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली थी। वह 1988 बैच के भारतीय वन सेवा के अधिकारी थे और उनकी नियमित सेवानिवृत्ति में करीब दो महीने बाकी थे। प्रदेश के वन विभाग के सर्वोच्च पद पर जिम्मेदारी संभालने के दौरान उनके सेवा छोड़ने का फैसला प्रशासनिक हलकों में चर्चा का विषय बना था।

उनके वीआरएस आवेदन को लेकर सामने आई जानकारी के अनुसार, उन्होंने 20 जून 2025 को आवेदन दिया था, जिसे अगले दिन स्वीकृति मिलने की खबरें आई थीं। उन्होंने व्यक्तिगत कारणों का हवाला दिया था। हालांकि, उनके फैसले के पीछे किसी ठोस विभागीय वजह की पुष्टि नहीं हुई।

मनोज चंद्रन के मामले में प्रक्रिया भी रही चर्चा में

अक्टूबर 2024 में भारतीय वन सेवा के अधिकारी मनोज चंद्रन ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए आवेदन किया था। उस समय वह मुख्य वन संरक्षक के पद पर तैनात थे। उनके मामले में वीआरएस के साथ विभागीय जांच और आरोपपत्र का विषय भी चर्चा में रहा।

तत्कालीन प्रमुख सचिव वन आरके सुधांशु ने आवेदन मिलने की पुष्टि करते हुए बताया था कि अधिकारी के खिलाफ आरोपपत्र जारी किया गया था और मामले की जांच चल रही थी। विवाद पदोन्नति और नियमितीकरण से संबंधित निर्णयों को लेकर था। मनोज चंद्रन ने नियमों के उल्लंघन के आरोपों से असहमति जताई थी।

चंद्रन ने यह दावा भी किया था कि वीआरएस के लिए निर्धारित नोटिस अवधि पूरी होने के बाद उनकी सेवानिवृत्ति और पेंशन से जुड़ी प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ी। इस तरह उनके मामले में केवल सेवा छोड़ने का फैसला ही नहीं, बल्कि उससे जुड़ी प्रशासनिक प्रक्रिया भी चर्चा का विषय बनी।

बीडी सिंह भी ले चुके हैं वीआरएस

स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने वाले अधिकारियों में बीडी सिंह का नाम भी शामिल है। वह पहले भारतीय वन सेवा के अधिकारी थे और बदरी-केदार मंदिर समिति में लंबे समय तक मुख्य कार्यकारी अधिकारी के पद पर रहे। बाद में उन्होंने वीआरएस ले लिया।

आईएएस और आईपीएस अधिकारियों के मामले भी आए सामने

उत्तराखंड में समय से पहले सेवा छोड़ने के मामले वन विभाग तक सीमित नहीं रहे हैं। भारतीय प्रशासनिक सेवा और भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों के नाम भी इस सूची में सामने आए हैं।

पूर्व आईएएस अधिकारी उमाकांत पंवार ने नियमित सेवानिवृत्ति से कई साल पहले सेवा छोड़ दी थी। उनकी पत्नी और पूर्व आईएएस अधिकारी मनीषा पंवार ने भी बाद में स्वास्थ्य संबंधी कारणों से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली थी।

पूर्व आईएएस अधिकारी राकेश कुमार ने भी निर्धारित समय से पहले सेवा छोड़ी थी। बाद में वह उत्तराखंड लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष बने। आईएएस अधिकारी भूपेंद्र कौर औलख और आईपीएस अधिकारी वी. विनय कुमार के नाम भी समयपूर्व सेवानिवृत्ति के मामलों में सामने आए हैं।

आईएएस अधिकारी बीवीआरसी पुरुषोत्तम ने पारिवारिक कारणों का हवाला देते हुए वीआरएस के लिए आवेदन किया था। उस समय उनके सेवाकाल में एक दशक से अधिक समय बाकी बताया गया था। उन्होंने अपने गृह राज्य में प्रतिनियुक्ति का विकल्प भी तलाशा था, लेकिन अंतरराज्यीय प्रतिनियुक्ति की प्रक्रिया में बाधाएं सामने आई थीं।

आईपीएस अधिकारी असीम श्रीवास्तव और रचिता जुयाल के नाम भी स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए आवेदन करने वाले अधिकारियों में शामिल रहे हैं। इनके मामलों में निजी क्षेत्र में बेहतर अवसरों की संभावना को सेवा छोड़ने के फैसले से जोड़ा गया।

उत्तर प्रदेश में आईएएस अधिकारी के रूप में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके सेवानिवृत्त अधिकारी एसएस पांगती के अनुसार, इन मामलों में सभी अधिकारियों की परिस्थितियां एक जैसी नहीं थीं। कहीं पारिवारिक कारण सामने आए, कहीं स्वास्थ्य संबंधी परिस्थितियां रहीं, तो कहीं दूसरे प्रशासनिक विकल्पों की बात कही गई।

निजी जीवन और करियर के बीच संतुलन भी वजह

अखिल भारतीय सेवाओं में चयन को लंबे समय से सुरक्षित करियर, सामाजिक प्रतिष्ठा और व्यापक प्रशासनिक जिम्मेदारियों से जोड़कर देखा जाता रहा है। लेकिन समय से पहले सेवानिवृत्ति के मामले यह सवाल उठाते हैं कि अधिकारी अपने करियर और निजी जीवन के बीच संतुलन कैसे तय कर रहे हैं।

निजी क्षेत्र में अवसर, पारिवारिक परिस्थितियां, स्वास्थ्य, गृह राज्य में रहने की इच्छा और व्यक्तिगत प्राथमिकताएं ऐसे फैसलों को प्रभावित कर सकती हैं। वहीं, प्रशासनिक जिम्मेदारियों, विभागीय प्रक्रियाओं और कामकाज के माहौल से जुड़े विषय भी कुछ मामलों में महत्वपूर्ण हो सकते हैं। हालांकि, हर अधिकारी के फैसले को एक ही कारण से जोड़कर देखना उचित नहीं होगा।

अधिकारियों की कमी के बीच बढ़ी चिंता

सेवानिवृत्त भारतीय वन सेवा अधिकारी जयराज का कहना है कि इन मामलों से संकेत मिलता है कि कुछ अधिकारी बेहतर वित्तीय अवसर मिलने पर प्रतिष्ठित सेवा छोड़ने का फैसला भी कर रहे हैं। उनके मुताबिक, अधिकारियों के समय से पहले सेवा से बाहर होने के मामलों को गंभीरता से समझने की जरूरत है।

उत्तराखंड में भारतीय वन सेवा से लेकर भारतीय प्रशासनिक सेवा तक अधिकारियों की कमी का मुद्दा पहले से उठता रहा है। ऐसे में यदि अधिकारी निर्धारित सेवाकाल पूरा होने से पहले बाहर जाते हैं, तो उपलब्ध अधिकारियों की संख्या पर इसका असर पड़ सकता है।

वीआरएस के लिए आवेदन करते समय कई अधिकारी व्यक्तिगत या पारिवारिक कारणों का उल्लेख करते हैं। ऐसे में फैसले के पीछे की वास्तविक वजहों का आकलन करना आसान नहीं होता। यह भी कहा जाता है कि कुछ अधिकारी बेहतर विकल्पों के बारे में खुलकर जानकारी देने से बच सकते हैं, क्योंकि उन्हें आवेदन स्वीकार नहीं होने की आशंका रहती है।

नियमों के मुताबिक, वीआरएस के आवेदन पर निर्धारित प्रक्रिया के तहत निर्णय लिया जाता है। सामान्य तौर पर तीन महीने की नोटिस अवधि पूरी होने पर सेवानिवृत्ति प्रभावी होने का प्रावधान है, बशर्ते संबंधित नियमों के तहत सरकार के पास इसे रोकने का कोई ठोस आधार न हो।

साकेत बडोला, मनोज चंद्रन और धनंजय मोहन के मामलों ने उत्तराखंड में समयपूर्व सेवानिवृत्ति पर चर्चा को फिर तेज कर दिया है। हालांकि, इन प्रकरणों के कारण अलग-अलग हैं और सभी को एक ही वजह से जोड़ने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है। अधिकारियों के सेवा छोड़ने के रुझान को समझने के लिए ठोस आंकड़ों, प्रत्येक मामले की परिस्थितियों और प्रशासनिक प्रक्रिया का तथ्यात्मक आकलन जरूरी है।