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उत्तराखंड में ₹80 हजार करोड़ के ‘कर्ज’ को सरकार ने और बढ़ाया, ‘माननीयों’ का भत्ता बढ़ने से छिड़ी बहस

By on February 4, 2026 0 2 Views

देहरादून: उत्तराखंड में एक बार फिर ‘माननीयों’ की सुविधाओं को लेकर सियासी और सार्वजनिक बहस तेज हो गई है. ऐसा इसलिए, क्योंकि जिस राज्य को सरकार, खुद आर्थिक रूप से चुनौतीपूर्ण बता रही है और मौजूदा समय में करीब 80 हजार करोड़ रुपए के भारी कर्ज के बोझ तले दबा हुआ है, उसी राज्य में मंत्रियों के खर्चों में कटौती के बजाय बढ़ोतरी का फैसला लिया गया है. फैसला मंत्रियों के यात्रा भत्ते में बढ़ोतरी से जुड़ा है, जिसने सरकार की प्राथमिकताओं पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं. ये सवाल न केवल कांग्रेस उठा रही है, बल्कि आम जनता भी सोचने पर मजबूर हो गई है.

सरकार ने लिया ये फैसला: उत्तराखंड सरकार ने वर्ष 2026 की शुरुआत में मंत्रियों को बड़ा आर्थिक लाभ देते हुए उनके यात्रा भत्ते में 50 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी कर दी है. अब राज्य के मंत्रियों को यात्रा व्यय के लिए प्रति माह 60 हजार रुपये की जगह 90 हजार रुपये मिलेंगे यानी सीधे तौर पर 30 हजार रुपये की बढ़ोतरी की गई है. सरकार का तर्क है कि यह फैसला नियमों और मौजूदा परिस्थितियों के तहत लिया गया है. लेकिन विपक्ष और आम जनता के बीच यह निर्णय उस समय और ज्यादा चुभता नजर आ रहा है, जब राज्य लगातार कर्ज के बोझ में डूबता जा रहा है.

संशोधन और बढ़ोतरी: यह निर्णय 29 जनवरी 2026 को जारी अधिसूचना के बाद लागू किया गया. उत्तराखंड शासन के मंत्री परिषद अनुभाग की ओर से जारी आदेश में उत्तर प्रदेश मंत्री यात्रा भत्ता नियमावली 1997 में संशोधन किया गया. इस संशोधन के बाद इसे उत्तर प्रदेश मंत्री (यात्रा भत्ता) (संशोधन) नियमावली 2026 के रूप में लागू किया गया है. इस बदलाव के जरिए मंत्रियों के यात्रा भत्ते की अधिकतम सीमा को बढ़ाया गया है. जिससे अब उन्हें अपने पदेन दायित्वों के दौरान की गई यात्राओं पर पहले से कई अधिक राशि खर्च करने की अनुमति मिल गई है.

संशोधन के तहत नियम 4 में बदलाव किया गया है, जिसके अनुसार मुख्यमंत्री, कैबिनेट मंत्री, राज्य मंत्री और उप मंत्री समेत सभी मंत्री अब उत्तराखंड के भीतर या भारत के भीतर अपने आधिकारिक दायित्वों के निर्वहन के लिए की गई यात्राओं पर प्रति कैलेंडर माह अधिकतम 90 हजार रुपये तक का पूरा खर्च ले सकेंगे. इससे पहले यह सीमा 60 हजार रुपये निर्धारित थी. यात्रा भत्ते बढ़ाने के दौरान सरकार का कहना था कि मंत्रियों को अलग अलग जिलों और क्षेत्रों में लगातार दौरे करने पड़ते हैं. ऐसे में यात्रा व्यय में बढ़ोतरी जरूरी थी. लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि क्या इस जरूरत का आकलन राज्य की आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखकर किया गया?

हर साल नए आदेश: मंत्रियों के यात्रा भत्ते में बढ़ोतरी को अगर बीते कुछ वर्षों के फैसलों से जोड़कर देखा जाए तो यह साफ नजर आता है कि ‘माननीयों’ पर सरकार की मेहरबानी कोई नई बात नहीं है. अगस्त 2024 में भी धामी सरकार ने विधायकों को बड़ा तोहफा देते हुए उनके वेतन और भत्तों में भारी बढ़ोतरी की थी. अगस्त 2024 से पहले विधायकों को वेतन और भत्तों को मिलाकर करीब 2 लाख 90 हजार रुपये मिलते थे लेकिन उत्तराखंड राज्य विधानसभा विविध संशोधन विधेयक 2024 के पारित होने के बाद यह राशि बढ़कर लगभग 4 लाख रुपये तक पहुंच गई. इतना ही नहीं, इससे पहले साल 2023 में भी धामी सरकार ने दायित्वधारियों के मानदेय में वृद्धि की थी. उस दौरान दायित्वधारियों के मानदेय में करीब 45 हजार रुपये का इजाफा किया गया था.

सरकार का तर्क था कि बढ़ती महंगाई और जिम्मेदारियों को देखते हुए यह फैसला जरूरी है, लेकिन विपक्ष ने उस समय भी इसे जनभावनाओं के खिलाफ बताया था. इसके बाद साल 2025 में सरकार ने पूर्व विधायकों की पेंशन में भी वृद्धि का फैसला लिया, जिससे यह साफ हो गया कि वर्तमान ही नहीं बल्कि पूर्व जनप्रतिनिधियों को भी लगातार आर्थिक लाभ दिए जा रहे हैं.

कांग्रेस ने ली चुटकी: इन तमाम फैसलों के बीच विपक्ष ने सरकार पर तीखा हमला बोला है. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने मंत्रियों के यात्रा भत्ते में बढ़ोतरी को लेकर सरकार पर तंज कसा है.

सरकार को भत्ते बढ़ाने से पहले प्रदेश में फैले भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी पर लगाम लगानी चाहिए. उन्होंने आरोप लगाया कि उत्तराखंड में हर काम में प्रतिशत का खेल चल रहा है और जब तक इस पर रोक नहीं लगेगी, तब तक इस तरह के फैसले जनता को गलत संदेश देते रहेंगे. उनका कहना है कि अगर सरकार को सुविधाएं बढ़ानी ही हैं तो पहले सिस्टम को साफ करना चाहिए.
हरीश रावत, पूर्व मुख्यमंत्री, उत्तराखंड-

गोदियाल ने उठाया सवाल: कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने भी इस फैसले पर गंभीर सवाल खड़े किए. उन्होंने कहा कि

सरकार को यह देखना होगा कि राज्य पर कर्ज किस तेजी से बढ़ रहा है. इसके बावजूद अगर हर साल मंत्रियों और विधायकों से जुड़े खर्चों में बढ़ोतरी की जाती रहेगी तो इसका सीधा नुकसान प्रदेश की आर्थिक सेहत को होगा. अगर मंत्रियों को अतिरिक्त सुविधाएं दी जा रही हैं तो सरकार यह बताए कि वे अपने-अपने प्रभारी जिलों में कितनी सक्रियता से काम कर रहे हैं. पिथौरागढ़, पौड़ी, हरिद्वार समेत अन्य जिलों में प्रभारी मंत्री कितने दौरे कर रहे हैं? कितनी बैठकों की अध्यक्षता कर रहे हैं? और जमीनी स्तर पर योजनाओं की समीक्षा कितनी हो रही है? यह सब भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए. जनता के पैसों से मंत्रियों के भत्ते तो बढ़ाए जा रहे हैं, लेकिन बदले में काम कितना हो रहा है? इसकी निगरानी भी उतनी ही जरूरी है. जब प्रदेश 80 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा के कर्ज में डूबा हो तब इस तरह के फैसले और ज्यादा सवाल खड़े करते हैं.
गणेश गोदियाल, कांग्रेस अध्यक्ष, उत्तराखंड-

अध्यक्ष बोले-सब पर रहती है नजर: उधर, भारतीय जनता पार्टी ने विपक्ष के आरोपों को सिरे से खारिज किया. प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने कहा कि,

सरकार और संगठन लगातार यह मॉनिटर करते हैं कि मंत्री और विधायक अपने-अपने जिलों में किस तरह से काम कर रहे हैं. सरकार हर महीने इसकी रिपोर्ट भी लेती है और कामकाज की नियमित समीक्षा की जाती है. अगर भत्ता बढ़ाया गया है तो इसे बेवजह बड़ा मुद्दा बनाना उचित नहीं है. महंगाई को देखते हुए समय-समय पर इस तरह के फैसले हर सरकार लेती है और यह सरकार का दायित्व भी होता है.
महेंद्र भट्ट, भाजपा अध्यक्ष, उत्तराखंड-

कर्ज के मुद्दे पर महेंद्र भट्ट ने कहा कि उत्तराखंड कोई अकेला राज्य नहीं है, बल्कि देश के कई राज्यों पर कर्ज है और इसी तरह से सरकारें चलती हैं. भाजपा का मानना है कि इस फैसले को राजनीतिक रंग देकर जनता को भ्रमित करने की कोशिश की जा रही है.

कैसे हो कर्ज कम: सियासी आरोप प्रत्यारोप से इतर आम जनता के बीच यह सवाल लगातार गूंज रहा है कि क्या आर्थिक अनुशासन सिर्फ आम लोगों के लिए है. एक तरफ सरकार आम नागरिकों से संयम बरतने, खर्च कम करने और संसाधनों का सही इस्तेमाल करने की अपील करती है. वहीं दूसरी तरफ ‘माननीयों’ की सुविधाओं में लगातार इजाफा किया जा रहा है. बढ़ते कर्ज, सीमित बजट और विकास की जरूरतों के बीच यह फैसला सरकार की प्राथमिकताओं पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है.

कुल मिलाकर उत्तराखंड में मंत्रियों के यात्रा भत्ते में बढ़ोतरी ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि आर्थिक संकट का बोझ आखिर कौन उठाएगा? प्रदेश पर बढ़ते कर्ज के बीच ‘माननीयों’ पर हो रही मेहरबानी को लेकर सवाल उठना लाजमी है. आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि सरकार इन सवालों का क्या जवाब देती है और क्या कभी ‘माननीयों’ के खर्चों पर भी नियंत्रण लगाने की दिशा में कोई ठोस कदम उठाया जाता है या फिर आर्थिक तंगी की मार यूं ही आम जनता पर पड़ती रहेगी.

उत्तराखंड के तमाम मुद्दों पर लगातार अपनी नजर और आर्थिक मामलों पर रिसर्च करने वाले विश्लेषक अनूप नौटियाल का कहना है कि,

चुनाव से पहले सरकार के मंत्रियों का भत्ता बढ़ाना, पूरी तरह से चुनावी रणनीति का हिस्सा है. सबसे गलत बात तो यह है कि पूरा कार्यकाल बीतने वाला है लेकिन अभी तक सरकार अपनी टीम को पूरी नहीं कर पाई है. मात्र 6 मंत्रियों के साथ सरकार चल रही है. इससे स्पष्ट होता है कि, कम मंत्रियों का होना, जनता के काम कम होना, स्वाभाविक है. लेकिन सरकार को यह भी सोचना चाहिए कि जनता के जुड़े और भी कई मुद्दे हैं, जिन पर ध्यान देना चाहिए.

सरकार पूरी तरह से ध्यान भटकाने के लिए रोजाना इस तरह के आदेश जारी कर रही है. आर्थिक रूप से हमारा राज्य कर्ज तले दब रहा है. छोटे से प्रदेश के लिए हम कर्ज लेते जा रहे हैं और चुकाने की सोच नहीं रहे हैं. सरकार को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि जो भत्ते बढ़ाए जा रहे हैं, उनका लाभ जनता को कितना मिल रहा है? यानी यह मंत्री जनता के बीच कितना जा रहे हैं?
अनूप नौटियाल, विश्लेषक-